धूमधाम से मनाई गई देश की प्रथम महिला शिक्षिका माता सावित्रीबाई फूले की 195वीं जयंती, शिक्षा और सामाजिक चेतना का दिया गया सशक्त संदेश

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रिपोर्ट: संदीप मिश्रा, रायबरेली, उत्तर प्रदेश, कड़क टाइम्स

दिनांक: 3 जनवरी 2026

रायबरेली। देश की प्रथम महिला शिक्षिका और सामाजिक क्रांति की अग्रदूत माता सावित्रीबाई फूले की 195वीं जयंती रायबरेली में अत्यंत गरिमामय और उत्साहपूर्ण वातावरण में धूमधाम से मनाई गई। इस अवसर पर संत रैदास आश्रम सामुदायिक केंद्र में विभिन्न सामाजिक संगठनों के संयुक्त तत्वावधान में भव्य आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी वर्ग, महिलाएं और युवा शामिल हुए। कार्यक्रम के दौरान विचार संगोष्ठी का आयोजन हुआ, वहीं समाजसेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाली महिलाओं को अंग वस्त्र एवं बुके भेंट कर सम्मानित किया गया। पूरे आयोजन में education, equality और social reform जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा देखने को मिली।

शनिवार को आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता वयोवृद्ध समाजसेवी रामेश्वर प्रसाद मौर्य ने की, जबकि संचालन विश्व दलित परिषद के अध्यक्ष राजेश कुरील ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत माता सावित्रीबाई फूले के चित्र पर माल्यार्पण और श्रद्धा सुमन अर्पित कर की गई। वक्ताओं ने कहा कि 19वीं सदी में जब समाज में महिलाओं की शिक्षा को लेकर गहरी रूढ़ियां और विरोध था, उस दौर में सावित्रीबाई फूले ने साहस और दृढ़ संकल्प के साथ शिक्षा की अलख जगाई और सामाजिक बदलाव की नींव रखी।

विचार संगोष्ठी को संबोधित करते हुए सामाजिक चिंतक डॉ. सुनील दत्त ने कहा कि सावित्रीबाई फूले ने विषम परिस्थितियों में भी शिक्षा के महत्व को समझा और समाज को नई दिशा दी। उन्होंने बताया कि अपने पति ज्योतिबा राव फूले के परिनिर्वाण के बाद सावित्रीबाई फूले ने लगातार सात वर्षों तक सत्य शोधक समाज का संचालन किया और सामाजिक सुधार की लड़ाई को आगे बढ़ाया। वे केवल एक शिक्षिका ही नहीं, बल्कि लेखिका, कवयित्री और समर्पित समाजसेविका भी थीं। उन्होंने बाल विवाह, सती प्रथा जैसी कुरीतियों का विरोध किया और विधवा पुनर्विवाह का समर्थन कर समाज में progressive thinking को बढ़ावा दिया।

कार्यक्रम में बुद्ध विहार कमेटी के संरक्षक इंजीनियर एस.के. आर्या ने शिक्षा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि विद्या के बिना विवेक और विवेक के बिना नीति संभव नहीं है। उन्होंने बताया कि सावित्रीबाई फूले और ज्योतिबा राव फूले ने 1 जनवरी 1848 को बालिकाओं के लिए पहला विद्यालय खोलकर देश में women education की मजबूत नींव रखी। अपने जीवनकाल में फूले दंपति ने दर्जनों विद्यालय स्थापित किए, जिससे देश की महिलाओं को शिक्षा के माध्यम से आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिला।

इंजीनियर रोहित प्रतिपक्षी ने अपने संबोधन में सावित्रीबाई फूले के जीवन पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए बताया कि उनका जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जनपद स्थित नायगांव में हुआ था। कम उम्र में विवाह के बावजूद उन्होंने शिक्षा प्राप्त की और अपने पति के साथ मिलकर छुआछूत, जाति-पांति, अंधविश्वास और सामाजिक आडंबरों के खिलाफ संघर्ष किया। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि यदि संकल्प मजबूत हो तो समाज की सबसे बड़ी बाधाओं को भी पार किया जा सकता है।

समण संस्कृति के संयोजक आर.एस. कटियार और डॉ. जे.के. भारत ने कहा कि सावित्रीबाई फूले का जीवन सेवा और त्याग की मिसाल है। उन्होंने बताया कि प्लेग महामारी के दौरान पीड़ितों की सेवा करते हुए 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया, लेकिन अंतिम सांस तक वे मानवता और शिक्षा की सेवा में लगी रहीं। वक्ताओं ने कहा कि आज के समय में सावित्रीबाई फूले के विचार और संघर्ष युवाओं के लिए inspiration हैं और समाज को समानता की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।

कार्यक्रम के दौरान सत्येश गौतम, प्रीतम कुमार, पुष्पा देवी, कमला बौद्ध, बुद्ध विहार कमेटी के अध्यक्ष चंद्रशेखर, राजेंद्र बौद्ध, हरिप्रसाद शास्त्री, विमल किशोर सबरा सहित कई वक्ताओं ने अपने विचार रखे और माता सावित्रीबाई फूले के योगदान को याद किया। सभी वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि शिक्षा ही समाज परिवर्तन का सबसे सशक्त माध्यम है और सावित्रीबाई फूले का जीवन इसी संदेश को मजबूती से स्थापित करता है।

इस अवसर पर अनिल कांत, आसाराम रावत, श्रीकांत दिवाकर, राजू दिवाकर, नीरज रावत, छोटेलाल गौतम, दीपक मौर्य और सूरज यादव सहित अनेक लोगों ने माता सावित्रीबाई फूले को श्रद्धा सुमन अर्पित किए। आयोजन समिति की ओर से कमला बौद्ध, पुष्पा रावत, अर्चना मोदनवाल, पूजा अग्रहरि, उर्मिला, गीता और सुनीता दिवाकर सहित समाजसेवी महिलाओं को अंग वस्त्र और बुके देकर सम्मानित किया गया, जिससे महिलाओं में सम्मान और आत्मविश्वास का भाव देखने को मिला।


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