सीढ़ियों से गिरने के हादसे में कोटेदार व सामाजिक कार्यकर्ता आशु पाण्डेय का असमय निधन, 42 वर्ष की उम्र में थम गई जनसेवा की राह, पूरे क्षेत्र में शोक

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रिपोर्ट: माया लक्ष्मी मिश्रा, रायबरेली, उत्तर प्रदेश, कड़क टाइम्स

महराजगंज/रायबरेली। हसनपुर गांव में बीती रात एक दर्दनाक हादसे ने पूरे क्षेत्र को गहरे शोक में डुबो दिया। गांव निवासी कोटेदार एवं सामाजिक कार्यकर्ता आशु पाण्डेय का अपने ही मकान की सीढ़ियों से फिसलकर गिरने के कारण निधन हो गया। वह 42 वर्ष के थे। इस अचानक हुई घटना की खबर मिलते ही गांव, कस्बे और आसपास के इलाकों में शोक की लहर दौड़ गई। कोई भी इस बात पर विश्वास नहीं कर पा रहा था कि जो व्यक्ति कल तक लोगों की मदद में लगा रहता था, वह इतनी जल्दी सबको छोड़कर चला जाएगा।

आशु पाण्डेय का जीवन संघर्ष, मेहनत और सेवा की मिसाल रहा। एक साधारण परिवार में जन्म लेकर उन्होंने अपने व्यवहार और कर्मों से समाज में विशेष स्थान बनाया। वह कोटेदार के रूप में अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभाते थे और कभी भी पात्र लाभार्थियों के अधिकारों से समझौता नहीं करते थे। गरीबों को समय पर राशन मिले, किसी का कार्ड न अटके, किसी बुजुर्ग को दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें—इस बात का वह हमेशा ध्यान रखते थे।

पूरर्ति विभाग से जुड़े कामों में भी वह लोगों की खुलकर मदद करते थे। जिन परिवारों के पास दस्तावेज अधूरे होते, उन्हें सही जानकारी देकर मार्गदर्शन करते और जरूरत पड़ने पर खुद साथ जाकर उनका काम पूरा करवाने की कोशिश करते थे। Office में भी उन्हें एक जिम्मेदार, साफ-सुथरी छवि वाले और भरोसेमंद सहयोगी के रूप में जाना जाता था। उनकी ईमानदारी और स्पष्टता के कारण लोग उन पर पूरा भरोसा करते थे।

उनका स्वभाव बेहद सरल और मिलनसार था। वह किसी से ऊंची आवाज में बात करना पसंद नहीं करते थे। गांव के छोटे-बड़े, सभी उनसे आत्मीयता महसूस करते थे। लोग कहते हैं कि आशु पाण्डेय ने कभी अपने पद या जिम्मेदारी का घमंड नहीं किया। वह आम लोगों के बीच रहकर, उन्हीं की तरह जीवन जीते थे। यही वजह थी कि उनकी पहचान केवल एक कोटेदार तक सीमित नहीं रही, बल्कि एक सच्चे समाजसेवी के रूप में बनी।

उनके असमय निधन से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। घर में मातम पसरा हुआ है। परिजन बदहवास हैं और हर आंख आंसुओं से भरी हुई है। पत्नी, बच्चे और बुजुर्ग माता-पिता का रो-रोकर बुरा हाल है। गांव के लोग परिवार को ढांढस बंधाने पहुंच रहे हैं, लेकिन इस गहरे जख्म को भर पाना किसी के लिए आसान नहीं है।

जैसे ही उनके निधन की सूचना फैली, उनके आवास पर शोक संवेदना व्यक्त करने वालों की भीड़ उमड़ पड़ी। देर रात से ही लोग उनके घर पहुंचने लगे। सुबह होते-होते जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े लोग भी वहां नजर आए। सभी ने शोकाकुल परिवार के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त की और इस दुख की घड़ी में साथ खड़े रहने का भरोसा दिलाया।

क्षेत्र के कई जनप्रतिनिधियों, पूर्व विधायकों, ब्लॉक स्तर के पदाधिकारियों, नगर पंचायत प्रतिनिधियों, ग्राम प्रधानों, कोटेदारों और संभ्रांत नागरिकों ने उनके आवास पर पहुंचकर श्रद्धांजलि अर्पित की। हर किसी के चेहरे पर दुख साफ झलक रहा था। लोग आपस में यही कहते नजर आए कि आशु पाण्डेय जैसे लोग समाज में बहुत कम होते हैं, जो बिना किसी स्वार्थ के दूसरों के लिए काम करते हैं।

अंतिम शव यात्रा के दौरान भी भारी संख्या में लोग शामिल हुए। गांव की गलियों से जब उनकी अर्थी उठी, तो माहौल पूरी तरह गमगीन हो गया। महिलाओं की सिसकियां और पुरुषों की नम आंखें इस बात का प्रमाण थीं कि दिवंगत आशु पाण्डेय ने लोगों के दिलों में कितनी गहरी जगह बनाई थी। अंतिम दर्शन के लिए लोग लंबी कतारों में खड़े नजर आए।

श्रद्धांजलि सभा में वक्ताओं ने कहा कि आशु पाण्डेय का जाना पूरे क्षेत्र के लिए एक बड़ी क्षति है। उन्होंने अपने जीवन में जो विश्वास और सम्मान अर्जित किया, वह वर्षों की सच्ची मेहनत और ईमानदारी का परिणाम था। वह सिर्फ सरकारी जिम्मेदारी निभाने वाले व्यक्ति नहीं थे, बल्कि जरूरतमंदों के लिए सहारा और समाज के लिए प्रेरणा थे।

स्थानीय लोगों का कहना है कि आशु पाण्डेय हमेशा ground level पर रहकर काम करते थे। उन्हें दिखावे या प्रचार में कभी रुचि नहीं रही। गरीबों की मदद करना, बुजुर्गों का सम्मान करना और युवाओं को सही रास्ता दिखाना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। यही वजह है कि उनका जाना हर वर्ग के लोगों को भीतर तक झकझोर गया है।

लोगों का मानना है कि उनकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी। गांव और क्षेत्र में जनसेवा से जुड़ा जो खालीपन पैदा हुआ है, उसे भर पाना आसान नहीं होगा। हालांकि उनके द्वारा किए गए अच्छे कार्य और उनकी यादें हमेशा लोगों के साथ रहेंगी।


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