रिपोर्ट: संदीप मिश्रा, रायबरेली, उत्तर प्रदेश, कड़क टाइम्स
सरकारी स्कूल, जहां बच्चों को ज्ञान, संस्कार और सुरक्षा का भरोसा दिया जाता है, वहीं अगर डर और जातिगत नफरत की तस्वीर सामने आए तो सवाल पूरे सिस्टम पर खड़े हो जाते हैं। रायबरेली जिले के महाराजगंज ब्लॉक स्थित प्राथमिक विद्यालय मांझगांव से सामने आई यह घटना सिर्फ एक छात्रा पर हमला नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय, शिक्षा व्यवस्था और कानून-व्यवस्था की गंभीर परीक्षा है। कक्षा 5 में पढ़ने वाली दलित छात्रा के साथ स्कूल परिसर के भीतर जो हुआ, उसने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर Safe School Environment की जिम्मेदारी किसकी है?
घटना प्रार्थना सभा के दौरान शुरू हुई बताई जा रही है। विद्यालय में पढ़ने वाली कक्षा 5 की दलित छात्रा और कक्षा 2 की एक अन्य छात्रा के बीच मामूली नोकझोंक हुई। बच्चों के बीच ऐसी छोटी-छोटी कहासुनी आम बात है, जिसे शिक्षक संवाद से सुलझाते रहे हैं। लेकिन इस बार मामला स्कूल की दीवारों के बाहर तक पहुंच गया। बताया जाता है कि शिकायत संबंधित अभिभावक तक पहुंची, जिसके बाद आवेश में आए एक ठाकुर अभिभावक ने स्कूल में घुसकर वह किया, जिसे सुनकर हर संवेदनशील व्यक्ति सिहर उठेगा।
आरोप है कि अभिभावक ने विद्यालय परिसर में ही दलित छात्रा को जातिसूचक शब्दों से अपमानित किया और थप्पड़ों व चप्पलों से पीटना शुरू कर दिया। यह सब बच्चों, शिक्षकों और रसोइए के सामने हुआ। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि घटना के दौरान किसी ने बीच-बचाव की हिम्मत नहीं दिखाई। स्कूल, जो बच्चों के लिए Second Home माना जाता है, वहीं एक बच्ची खुद को असहाय महसूस करती रही।
हमले के बाद घायल छात्रा को घर ले जाया गया। परिजनों का कहना है कि उन्होंने स्कूल प्रशासन से लिखित शिकायत की, लेकिन पूरे मामले में चुप्पी साध ली गई। इसके बाद परिवार ने थाने में भी तहरीर दी, मगर करीब दो सप्ताह बीत जाने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। न जांच शुरू हुई, न बयान दर्ज हुए, और न ही आरोपी पर कोई प्रभावी कदम उठाया गया। यह चुप्पी अपने आप में कई सवाल खड़े करती है—क्या पीड़ित की जाति ही देरी की वजह है?
परिजनों ने जब स्थानीय स्तर पर न्याय नहीं मिला तो क्षेत्राधिकारी महाराजगंज से गुहार लगाई। आश्वासन मिला कि जल्द कार्रवाई होगी, लेकिन एक सप्ताह बाद भी न तो स्कूल पहुंचकर जांच हुई और न ही पीड़ित पक्ष को कोई राहत। आखिरकार थक-हारकर दलित परिवार ने पुलिस अधीक्षक से न्याय की उम्मीद लगाई है। परिवार का कहना है कि उन्हें सिर्फ इंसाफ चाहिए, ताकि भविष्य में किसी और बच्ची के साथ ऐसा न हो।
यह घटना ऐसे समय सामने आई है जब देशभर में शिक्षा, समानता और Social Justice को लेकर बहस चल रही है। सुप्रीम कोर्ट और नीतिगत चर्चाओं के बीच जमीनी हकीकत यह दिखाती है कि नियम-कानून तब तक बेमानी हैं, जब तक उनका पालन सख्ती से न हो। सवाल यह भी है कि स्कूल प्रशासन की जिम्मेदारी कहां थी? क्या शिक्षकों का मौन भी अपराध की श्रेणी में नहीं आता?
ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए यह मामला एक Wake-up Call है। यदि स्कूल के भीतर ही जातिगत हिंसा हो और सिस्टम आंखें मूंद ले, तो भरोसा कैसे कायम रहेगा? पीड़ित परिवार की मांग है कि आरोपी के खिलाफ सख्त धाराओं में केस दर्ज हो, स्कूल स्तर पर जवाबदेही तय की जाए और बच्ची को न्याय व सुरक्षा मिले।




