रिपोर्टर: मायालक्ष्मी मिश्रा, रायबरेली
रायबरेली जिले के सलोंन कस्बे में शुक्रवार को ऐसी घटना सामने आई जिसने इंसानियत और आपसी भाईचारे की एक मिसाल कायम कर दी। यह घटना उस वक्त चर्चा में आ गई जब एक हिंदू युवक की मां के निधन पर दर्जनों मुस्लिम युवकों ने न सिर्फ शोक जताया, बल्कि अंतिम संस्कार की पूरी प्रक्रिया में अपने हिंदू दोस्त के साथ कंधे से कंधा मिलाकर पूरी भागीदारी निभाई।
यह घटना न केवल स्थानीय लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बनी, बल्कि अब यह सोशल मीडिया पर भी वायरल हो रही है। लोग इसे Hindu-Muslim Unity, Brotherhood in India, Ganga-Jamuni Tehzeeb, और Secular India जैसे ट्रेंडिंग हैशटैग के साथ साझा कर रहे हैं।
घटना का विवरण
सलोंन कस्बे के मिल कियाना पूर्वी वार्ड में रहने वाले पूर्व सभासद राधे बाबा पटवा के बेटे उमेश पटवा की मां का गुरुवार की शाम को निधन हो गया। दुख की इस घड़ी में जब उनके परिवार को अंतिम संस्कार की तैयारियों में मदद की ज़रूरत थी, तब आसपास के मुस्लिम मोहल्ले के युवकों ने बिना किसी हिचक के आगे आकर पूरा साथ दिया।
करीब 35 से 40 मुस्लिम युवक न केवल शोक व्यक्त करने पहुंचे, बल्कि पारंपरिक हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार अंतिम संस्कार की सभी आवश्यक व्यवस्थाओं में भी हिस्सा लिया। उन्होंने शव को कंधा दिया, चिता की लकड़ी जुटाई, और घाट तक शवयात्रा में शामिल होकर हर रस्म को पूरी श्रद्धा के साथ निभाया।
मुस्लिम युवकों की सूची जिन्होंने निभाई भूमिका
इस नेक कार्य में जिन मुस्लिम युवकों ने सहयोग किया, उनमें प्रमुख रूप से मोहम्मद आज़म खान मेवाती, आलम मेवाती, इस्लाम मेवाती, शकील मेवाती, माशूक मेवाती, चांद मेवाती, पप्पू कुरैशी, हाफिज़ उमर, जुनैद सलमानी, क़ासिम घोसी, सद्दाम घोसी, ठाकुर सलमानी, अशफ़ाक सलमानी, शाहबाज सलमानी, गोरे सलमानी, ख़लील बाबा, मुनीर सलमानी, क़ासिम मेवाती सहित कई अन्य युवक शामिल थे।
इन सभी ने मिलकर यह सिद्ध किया कि धर्म कोई दीवार नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने का माध्यम हो सकता है। इस कृत्य से यह स्पष्ट हुआ कि जब बात इंसानियत की हो, तो धर्म, जाति और मजहब की दीवारें स्वत: ही गिर जाती हैं।
समाज को मिली नई प्रेरणा
इस घटना को लेकर पूरे नगर में सकारात्मक चर्चा शुरू हो गई है। लोग इसे दिल को छू लेने वाला क्षण मान रहे हैं और समाज में भाईचारे की भावना को फिर से जीवित करने की बात कर रहे हैं। क्षेत्रीय लोगों का मानना है कि ऐसी घटनाएं न केवल सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा देती हैं, बल्कि उन शक्तियों को भी करारा जवाब देती हैं जो हर बात को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश करती हैं।
स्थानीय नागरिक राकेश श्रीवास्तव ने कहा, “जब चारों तरफ नफरत का माहौल फैलाने की कोशिश हो रही हो, उस समय सलोंन जैसे कस्बे से ऐसी खबरें आना उम्मीद की किरण है।”
शकील मेवाती, जो अंतिम संस्कार में सक्रिय रूप से शामिल रहे, ने कहा, “हमने दोस्त की मां को अपनी मां समझा। धर्म बाद में आता है, पहले इंसानियत होती है।”
राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर भी तारीफ
घटना की जानकारी जब प्रशासन और जनप्रतिनिधियों तक पहुंची तो उन्होंने भी इस पहल को सराहा। एक क्षेत्रीय विधायक ने कहा कि यह घटना समाज को एकजुट रखने के लिए मिसाल है। उन्होंने कहा, “हम सभी को इस घटना से प्रेरणा लेकर अपने आस-पास के माहौल को बेहतर बनाने की कोशिश करनी चाहिए।”
सोशल मीडिया पर सकारात्मक प्रतिक्रियाएं
जैसे ही यह खबर सोशल मीडिया पर सामने आई, लोगों ने दिल खोलकर प्रतिक्रियाएं दीं।
- एक यूजर ने लिखा, “यह है असली भारत, जहां मजहब इंसानियत से ऊपर नहीं है।”
- दूसरे ने कहा, “अगर हर मोहल्ला ऐसा हो जाए तो नफरत की राजनीति खुद खत्म हो जाएगी।”
- तीसरे ने कमेंट किया, “इस खबर को हर न्यूज़ चैनल को प्रमुखता से दिखाना चाहिए।”
यह खबर फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर Hindu Muslim Ekta, Real India, Insaniyat Zindabad, Unity Over Religion जैसे हैशटैग्स के साथ वायरल हो रही है।
क्यों है यह खबर महत्वपूर्ण?
- हिंदू-मुस्लिम एकता का जीवंत उदाहरण
- समाज को इंसानियत का नया पाठ पढ़ाने वाली घटना
- 35+ मुस्लिम युवकों की सक्रिय भागीदारी
- सांप्रदायिक राजनीति करने वालों को सीधा संदेश
- मीडिया और जनता दोनों के लिए प्रेरणास्रोत
निष्कर्ष
जब दुनिया में धर्म के नाम पर विभाजन की राजनीति हो रही है, तब सलोंन जैसे छोटे कस्बे से आई यह खबर बताती है कि भारत की असली ताकत उसकी संवेदनशीलता, आपसी समझ और मानवता में विश्वास है।
इस घटना ने यह भी साबित कर दिया कि हिंदू-मुस्लिम एकता कोई बीता हुआ इतिहास नहीं है, बल्कि आज भी हर मोहल्ले, हर गली और हर गांव में जिंदा है। जरूरत है तो बस उसे अपनाने और आगे बढ़ाने की।
यह खबर सिर्फ एक समाचार नहीं, बल्कि एक ऐसा संदेश है जो हर नागरिक को यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम कौन-सी दुनिया बना रहे हैं – नफरत की या मोहब्बत की?