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TET अनिवार्यता के खिलाफ सड़कों पर उतरे हजारों शिक्षक

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रिपोर्ट: माया लक्ष्मी मिश्रा, रायबरेली, उत्तर प्रदेश, कड़क टाइम्स
रायबरेली, 16 सितम्बर 2025

रायबरेली की सड़कों पर सोमवार का दिन शिक्षक आंदोलन के नाम रहा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बेसिक शिक्षा विभाग में कार्यरत शिक्षकों के लिए टीईटी (Teacher Eligibility Test) अनिवार्य किए जाने के खिलाफ शिक्षकों ने जमकर विरोध प्रदर्शन किया। राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (Rashtriya Shikshik Mahasangh) के बैनर तले हजारों शिक्षक रायबरेली शहर में उतरे और टीईटी की अनिवार्यता को शिक्षा जगत के लिए अन्यायपूर्ण बताया।

शिक्षकों का कहना है कि यह फैसला उनके सम्मान और अधिकारों के खिलाफ है। उन्होंने प्रधानमंत्री और केंद्रीय शिक्षा मंत्री से कानून में संशोधन करने की मांग की।


विकास भवन बना विरोध का गवाह

सुबह से ही जिले भर से आए शिक्षक विकास भवन रायबरेली में एकत्र हुए। हाथों में बैनर और तख्तियां लिए शिक्षकों ने “TET अनिवार्यता खत्म करो”, “शिक्षकों का अपमान बंद करो”, “पुरानी भर्ती पर नया कानून अन्याय है” जैसे नारे लगाए।

राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के आह्वान पर न सिर्फ रायबरेली बल्कि पूरे देश के अलग-अलग जिलों में भी इसी तरह का आंदोलन हुआ। जिला प्रशासन को प्रधानमंत्री और शिक्षा मंत्री के नाम ज्ञापन सौंपकर टीईटी की अनिवार्यता को हटाने की मांग की गई।


चार लाख से अधिक शिक्षकों पर संकट

महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष शिव शंकर सिंह ने प्रदर्शन में मौजूद शिक्षकों को संबोधित करते हुए कहा:

“शिक्षा का अधिकार लागू होने से पहले उत्तर प्रदेश में करीब चार लाख शिक्षक कार्यरत थे। 29 जुलाई 2011 के बाद नई नियुक्तियों के लिए टीईटी को अनिवार्य किया गया। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद पहले से कार्यरत शिक्षकों को भी इसकी जद में लाया जा रहा है, जबकि उनकी भर्ती उस समय की निर्धारित योग्यता के अनुसार हुई थी।”

उन्होंने आगे कहा कि यदि उस समय यह शर्त होती तो हर शिक्षक पहले ही टीईटी पास करके आता। अब वर्षों बाद यह शर्त थोपना न केवल अनुचित है बल्कि यह शिक्षकों की मेहनत और सेवा भावना का अपमान है।


शिक्षकों की नाराजगी चरम पर

प्रदर्शन में शामिल शिक्षकों ने कहा कि पहले से कार्यरत शिक्षकों पर इस तरह का दबाव बनाना न सिर्फ कानूनी तौर पर गलत है बल्कि इससे शिक्षा व्यवस्था पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा।

एक शिक्षक ने नाराजगी जताते हुए कहा:

“हम पिछले 10-15 सालों से बच्चों को पढ़ा रहे हैं। हमारे अनुभव और योग्यता पर कोई सवाल नहीं उठा सकता। अब अचानक से टीईटी अनिवार्य करना हमारी नौकरी और सम्मान दोनों पर खतरा है।”


आंदोलन की राष्ट्रीय गूंज

यह विरोध सिर्फ रायबरेली तक सीमित नहीं रहा। अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ की अपील पर देशभर के शिक्षकों ने एक साथ जिलाधिकारियों को ज्ञापन सौंपा। इससे यह साफ है कि आने वाले दिनों में यह आंदोलन और बड़ा रूप ले सकता है।

सोशल मीडिया पर भी #TET_अनिवार्यता_खत्म_करो और #Teachers_Protest जैसे हैशटैग तेजी से ट्रेंड कर रहे हैं। इससे साफ है कि शिक्षक वर्ग इस मुद्दे को लेकर अब चुप नहीं बैठने वाला।


क्यों हो रहा है विरोध?

शिक्षकों के आंदोलन के पीछे कुछ मुख्य कारण सामने आए हैं –

  1. पुरानी नियुक्तियों पर नया नियम थोपना – जिन शिक्षकों की भर्ती पहले की योग्यताओं के अनुसार हुई थी, उन पर अब नई शर्त लागू करना गलत बताया जा रहा है।
  2. नौकरी असुरक्षा का डर – टीईटी अनिवार्य होने पर हजारों शिक्षक असमंजस में हैं कि यदि परीक्षा पास न कर पाए तो उनकी नौकरी खतरे में पड़ सकती है।
  3. अनुभव की अनदेखी – वर्षों से बच्चों को पढ़ाने का अनुभव रखने वाले शिक्षकों का मानना है कि अनुभव को योग्यता के पैमाने से बाहर रखना अनुचित है।
  4. शिक्षक सम्मान पर आघात – आंदोलनकारियों का कहना है कि इस तरह का निर्णय उनकी वर्षों की मेहनत और योगदान को नजरअंदाज करता है।

शिक्षकों की मांग

प्रदर्शन के दौरान शिक्षकों ने सरकार से कुछ प्रमुख मांगें रखीं:


आंदोलन आगे और तेज होगा

आंदोलनकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द विचार नहीं किया गया तो यह विरोध और उग्र होगा।

प्रदेश अध्यक्ष शिव शंकर सिंह ने कहा:

“हमारी आवाज़ को अगर नजरअंदाज किया गया तो आने वाले दिनों में शिक्षक वर्ग सड़कों पर और भी बड़े पैमाने पर उतरेगा। यह सिर्फ एक शुरुआत है।”


शिक्षा पर असर

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की स्थिति से शिक्षा व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। जब शिक्षक असुरक्षा और असंतोष से घिरेंगे तो पढ़ाई पर सीधा असर पड़ेगा।

रायबरेली में प्रदर्शन कर रहे एक शिक्षक ने कहा:

“हम बच्चों का भविष्य बनाने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं। सरकार को चाहिए कि हमारे भविष्य की भी रक्षा करे। अगर शिक्षक ही असुरक्षित होंगे तो शिक्षा की गुणवत्ता कैसे सुधरेगी?”


निष्कर्ष

रायबरेली की सड़कों पर उतरे हजारों शिक्षकों का यह प्रदर्शन साफ संकेत देता है कि टीईटी की अनिवार्यता को लेकर शिक्षकों में गहरा असंतोष है।
यह आंदोलन सिर्फ रोजगार का सवाल नहीं, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और न्याय का मुद्दा बन चुका है।

अब देखना यह है कि सरकार और शिक्षा मंत्रालय इस मुद्दे को कैसे हल करते हैं। क्या शिक्षकों की आवाज सुनी जाएगी या आंदोलन और तेज होगा?


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