बैंती रजबहा की सफाई में भारी लापरवाही, जेसीबी से हुए खिलवाड़ ने बढ़ाई किसानों की मुसीबत

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रिपोर्ट: माया लक्ष्मी मिश्रा, रायबरेली, उत्तर प्रदेश, कड़क टाइम्स

शिवगढ़, रायबरेली। सिंचाई विभाग की लापरवाही एक बार फिर किसानों पर भारी पड़ती नजर आ रही है। हैदरगढ़ खण्ड 28 के अंतर्गत आने वाले बैंती रजबहा की सफाई के नाम पर बीते एक दशक से केवल औपचारिकता निभाई जा रही है, जिससे किसानों, ग्रामीणों और राहगीरों में भारी रोष व्याप्त है। स्थानीय किसानों का आरोप है कि विभाग द्वारा हर वर्ष जेसीबी मशीन से सिर्फ सिल्ट निकालकर रजबहा की सर्विस पटरी पर जगह-जगह ढेर लगा दिए जाते हैं, लेकिन न तो डौला बनाया जाता है और न ही इन मिट्टी के ढेरों को समतल कराया जाता है।

किसान शैलेंद्र तिवारी, अशोक कुमार, विनोद कुमार, विजय कुमार सहित अन्य ग्रामीणों ने बताया कि बैंती रजबहा की सही तरीके से सफाई न होने के कारण हर साल रजबहा जगह-जगह कट जाता है। इसका सीधा नुकसान किसानों की गेहूं और धान की फसलों को उठाना पड़ता है, जो पानी भर जाने से जलमग्न हो जाती हैं। किसानों का कहना है कि इस बार भी हालात वही हैं, सिर्फ नाम के लिए सफाई कर दी गई है, जबकि जमीनी स्तर पर समस्या जस की तस बनी हुई है।

ग्रामीणों के अनुसार जेसीबी से निकाली गई सिल्ट को रजबहा की सर्विस पटरी पर ढेर के रूप में छोड़ दिया गया है। न तो डौला तैयार किया गया और न ही विभाग ने इन ढेरों को बराबर कराने की जहमत उठाई। एक ओर जहां सर्विस पटरी ऊबड़-खाबड़ और गड्ढों में तब्दील हो चुकी है, वहीं दूसरी ओर बड़ी-बड़ी घास, झाड़ियां और मिट्टी के टीले लगे हुए हैं। यह सर्विस पटरी दर्जनों गांवों को जोड़ने वाला अहम रास्ता है, जिस पर रोजाना भारी संख्या में ग्रामीण, किसान और राहगीर आवागमन करते हैं।

किसानों ने बताया कि सिल्ट के ढेरों के कारण खेतों तक ट्रैक्टर, पम्पिंग सेट और अन्य कृषि उपकरण ले जाना बेहद मुश्किल हो गया है। कई स्थानों पर तो रास्ता लगभग बंद सा हो गया है। वहीं राहगीरों को भी पैदल और दोपहिया वाहनों से गुजरने में गंभीर परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि रजबहा की पटरी पर पड़े सिल्ट के ढेरों का खुलेआम अवैध खनन किया जा रहा है, लेकिन सिंचाई विभाग इस पूरे मामले में मूकदर्शक बना हुआ है।

इस संबंध में जब सिंचाई विभाग के जेई सुभाष सोनकर से बात की गई तो उन्होंने बताया कि फिलहाल केवल सिल्ट सफाई का कार्य कराया गया है। डौला निर्माण के लिए अलग से बजट आता है, जिसके अभाव में वह कार्य नहीं हो सका। हालांकि किसानों का कहना है कि विभाग हर साल यही तर्क देता है, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान आज तक नहीं किया गया।


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