कोर्ट का स्टे, पुलिस की चुप्पी और आखिर तहसीलदार की एंट्री—छह दिन से चलता निर्माण अचानक क्यों रुका?

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रिपोर्ट: माया लक्ष्मी मिश्रा, रायबरेली, उत्तर प्रदेश, कड़क टाइम्स

महराजगंज/रायबरेली। कस्बा महराजगंज में एक बार फिर कानून, प्रशासन और पुलिस की भूमिका को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। माननीय सिविल न्यायालय द्वारा यथा स्थिति बनाए रखने के स्पष्ट आदेश के बावजूद विगत छह दिनों से जारी विवादित निर्माण कार्य को आखिरकार तहसीलदार के हस्तक्षेप पर रोक दिया गया। यह कार्रवाई तब हुई जब पीड़ित लगातार छह दिनों तक पुलिस से गुहार लगाता रहा, लेकिन उसकी सुनवाई नहीं हुई। मामला सामने आने के बाद अब पूरे कस्बे में यह चर्चा तेज है कि अगर न्यायालय का आदेश पहले ही मौजूद था, तो निर्माण इतने दिनों तक चलता कैसे रहा?

पूरा मामला कस्बा स्थित भूमि संख्या 254 से जुड़ा है, जिसका खेवट रकबा 0.096 दर्ज है। राजस्व अभिलेखों के अनुसार यह भूमि मकसूद अली आदि के नाम दर्ज कागजात में अंकित है। इसी भूमि को लेकर माननीय सिविल न्यायालय द्वारा स्पष्ट रूप से मौके पर यथा स्थिति बनाए रखने यानी status quo का आदेश पारित किया गया था। आदेश का आशय साफ था कि जब तक न्यायालय में मामला विचाराधीन है, तब तक न तो कोई नया निर्माण होगा और न ही भूमि की स्थिति में कोई परिवर्तन किया जाएगा।

इसके बावजूद शिकायतकर्ता का आरोप है कि विपक्षी रामसुमिरन पुत्र ननकऊ, स्थानीय पुलिस की कथित मिलीभगत से, लगातार विवादित भूमि पर निर्माण कार्य करवा रहे थे। पीड़ित पक्ष का कहना है कि उसने कई बार पुलिस को मौके पर बुलाया, कोर्ट के आदेश की प्रति दिखाई और निर्माण रुकवाने की मांग की, लेकिन हर बार उसे आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला। छह दिनों तक construction work जारी रहा और पुलिस मूकदर्शक बनी रही, जिससे पीड़ित का आक्रोश बढ़ता चला गया।

आखिरकार पीड़ित ने तहसील प्रशासन का दरवाजा खटखटाया और पूरे मामले की लिखित शिकायत तहसील की मुखिया तहसीलदार मंजुला मिश्रा से की। शिकायत में न सिर्फ कोर्ट के स्थगन आदेश का हवाला दिया गया, बल्कि यह भी आरोप लगाया गया कि जानबूझकर न्यायालय के आदेश की अवहेलना की जा रही है। मामला संज्ञान में आते ही तहसीलदार ने तत्परता दिखाते हुए दोनों पक्षों को तलब किया और पूरे प्रकरण की गंभीरता से समीक्षा की।

तहसीलदार मंजुला मिश्रा ने दोनों पक्षों को स्पष्ट शब्दों में निर्देश दिया कि माननीय न्यायालय के आदेश का पालन अनिवार्य है और मौके पर यथा स्थिति बनाए रखी जाए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि स्थगन आदेश के बावजूद किसी भी पक्ष द्वारा निर्माण या भूमि की स्थिति में बदलाव किया गया, तो संबंधित के खिलाफ विधिक कार्रवाई की जाएगी। तहसीलदार के इस सख्त रुख के बाद ही विवादित स्थल पर चल रहा निर्माण कार्य तत्काल प्रभाव से रुकवाया गया।

इस कार्रवाई के बाद स्थानीय लोगों में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। आमजन का सवाल है कि जब कोर्ट का आदेश पहले से मौजूद था, तो पुलिस ने अपनी जिम्मेदारी क्यों नहीं निभाई? क्या बिना प्रशासनिक दबाव के कानून का पालन संभव नहीं रह गया है? यह मामला एक बार फिर law and order और ground level policing पर सवाल खड़े करता है। लोग यह भी कह रहे हैं कि यदि तहसीलदार समय पर हस्तक्षेप न करतीं, तो विवाद और भी गहरा सकता था, जिससे शांति व्यवस्था प्रभावित होने की पूरी आशंका थी।

पीड़ित पक्ष का कहना है कि उसे अभी भी न्यायालय और प्रशासन पर भरोसा है, लेकिन वह चाहता है कि इस मामले में पुलिस की भूमिका की भी जांच हो। वहीं विपक्षी पक्ष का तर्क है कि वह अपना पक्ष न्यायालय में रखेगा और कानून के दायरे में रहकर ही आगे की कार्रवाई करेगा। फिलहाल निर्माण रुकने से स्थिति कुछ हद तक शांत जरूर हुई है, लेकिन अंदर ही अंदर तनाव बना हुआ है।


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