रिपोर्ट: माया लक्ष्मी मिश्रा, रायबरेली, उत्तर प्रदेश कड़क टाइम्स
रायबरेली, 10 सितम्बर 2025
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सड़क सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए शुरू किया गया “नो हेलमेट – नो फ्यूल अभियान” रायबरेली जिले में मजाक बनकर रह गया है। ज्यादातर पेट्रोल पंपों पर इस नियम की खुलेआम अनदेखी हो रही है। पंप कर्मचारी बिना हेलमेट वाले चालकों को पेट्रोल उपलब्ध करा रहे हैं और जिम्मेदार अधिकारी खामोश दर्शक बने हुए हैं।
पेट्रोल पंपों पर नियमों की अनदेखी
जिला मुख्यालय समेत कई इलाकों के पंपों पर यह देखा गया कि कर्मचारी बिना हेलमेट वालों को पेट्रोल देने से मना नहीं कर रहे। इतना ही नहीं, कुछ वाहन चालक दूसरों से हेलमेट मांगकर पेट्रोल डलवा रहे हैं और यह पूरा घटनाक्रम सीसीटीवी कैमरों में भी दर्ज हो रहा है।
सड़क सुरक्षा पर मंडराता खतरा
अभियान का उद्देश्य लोगों को हेलमेट पहनने की आदत डालना और सड़क हादसों में होने वाली मौतों को कम करना है। लेकिन जब पंपों पर ही नियम टूटेंगे तो आम जनता तक इसका संदेश कैसे पहुंचेगा? रायबरेली की सड़कों पर आए दिन दर्जनों बाइक सवार बिना हेलमेट तेज रफ्तार से चलते दिखाई देते हैं। यह लापरवाही न केवल उनकी बल्कि दूसरों की जान के लिए भी खतरा है।
सरकार का स्पष्ट आदेश
सरकार द्वारा जारी नियमों के अनुसार –
- बिना हेलमेट आने वाले दोपहिया चालकों को पेट्रोल या डीजल नहीं दिया जाएगा।
- यह नियम चालक और पीछे बैठे सवारी दोनों पर लागू है।
- नियम तोड़ने वालों पर चालान और बार-बार उल्लंघन करने पर सख्त कार्रवाई का प्रावधान है।
- पेट्रोल पंप संचालकों को भी निर्देश दिए गए हैं कि वे नियम तोड़ने वालों को किसी भी हालत में ईंधन न दें।
जमीनी सच्चाई
रायबरेली में हालात सरकार के आदेशों से बिल्कुल अलग हैं। अनुज पेट्रोल पंप, जलालपुर सहित कई पंपों पर बिना हेलमेट वाले ग्राहकों को आराम से पेट्रोल मिलता देखा गया। कर्मचारियों का कहना है कि “अगर हम मना करते हैं तो ग्राहक बहस करने लगते हैं, इसलिए मजबूरी में पेट्रोल देना पड़ता है।”
यह बयान बताता है कि अभियान की निगरानी सही तरीके से नहीं हो रही है और प्रशासन इसे गंभीरता से नहीं ले रहा।
जिम्मेदार अधिकारी खामोश 
जिला प्रशासन और ट्रैफिक पुलिस की जिम्मेदारी है कि वे इस नियम को लागू कराएं। लेकिन हकीकत यह है कि अधिकारी केवल बैठकों और घोषणाओं तक ही सीमित हैं। पेट्रोल पंपों का नियमित निरीक्षण न के बराबर हो रहा है और न ही कर्मचारियों पर कोई कड़ी कार्रवाई की जा रही है।
मौत के आंकड़ों से सबक क्यों नहीं?
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि हर साल देश में होने वाले सड़क हादसों में करीब 40 प्रतिशत मामले दोपहिया वाहनों से जुड़े होते हैं। इनमें से ज्यादातर मौतें सिर पर चोट लगने के कारण होती हैं। हेलमेट पहनने से मौत का खतरा 70 प्रतिशत तक और गंभीर चोट का खतरा 40 प्रतिशत तक कम हो सकता है।
इसके बावजूद लोग हेलमेट पहनने से बचते हैं। उनका तर्क होता है कि इससे गर्मी लगती है या असुविधा होती है। यह सोच न केवल गलत है बल्कि जानलेवा भी साबित हो रही है।
अभियान का असली मकसद
अगर अभियान सही तरीके से लागू हो तो –
- लोग मजबूर होकर हेलमेट पहनना शुरू करेंगे।
- सड़क हादसों में मृत्यु दर कम होगी।
- यातायात नियमों का पालन बढ़ेगा।
- समाज में सुरक्षा की जागरूकता फैलेगी।
लेकिन प्रशासन की ढिलाई ने इस अभियान को बेअसर बना दिया है।
लोगों की राय
रायबरेली निवासी राजीव कुमार का कहना है –
“जब तक पंप कर्मचारी सख्ती नहीं करेंगे, लोग हेलमेट घर पर ही छोड़कर निकलते रहेंगे। प्रशासन को पंपों पर निरीक्षण बढ़ाना चाहिए।”
वहीं कॉलेज छात्रा श्वेता ने कहा –
“लोग पुलिस से बचने के लिए हेलमेट हाथ में रखते हैं, पहनते नहीं। अगर पंपों पर उन्हें पेट्रोल ही न मिले तो वे हेलमेट पहनने को मजबूर होंगे।”
निष्कर्ष
रायबरेली में “नो हेलमेट – नो फ्यूल” अभियान फिलहाल कागजों पर ही सिमट कर रह गया है। सड़क सुरक्षा जैसे अहम मुद्दे पर प्रशासन की लापरवाही साफ दिखाई दे रही है। अगर समय रहते सख्ती नहीं की गई तो यह अभियान कभी अपने उद्देश्य तक नहीं पहुंच पाएगा।
लोगों को यह समझना होगा कि हेलमेट पहनना उनकी सुरक्षा के लिए जरूरी है। प्रशासन और पेट्रोल पंप संचालकों को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। वरना सड़क हादसों की संख्या और बढ़ेगी और यह अभियान सिर्फ नाम का रह जाएगा।





