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बजरंग दल के आंदोलन के बाद पुलिस की ‘Transfer Policy’ सवालों में, रायबरेली में उठा भरोसे का संकट

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रिपोर्ट: संदीप मिश्रा, रायबरेली, उत्तर प्रदेश, कड़क टाइम्स

रायबरेली। जिले में बीते दिनों बजरंग दल और सलोन कोतवाली के बीच उपजे विवाद ने पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है। तीन दिन तक चले विरोध-प्रदर्शन और राजनीतिक हस्तक्षेप के बाद जिस तरह अचानक कई थानों के प्रभारियों का तबादला किया गया, उसने आम जनता के मन में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह कार्रवाई कानून और निष्पक्षता के आधार पर हुई, या फिर यह सड़क पर दिखे दबाव का नतीजा थी।

सलोन कोतवाली के प्रभारी निरीक्षक राघवन कुमार सिंह को लेकर बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने गंभीर आरोप लगाए थे। संगठन का कहना था कि पुलिस ने उनके लोगों के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार किया और नियमों के विरुद्ध कार्रवाई की। मामला बढ़ने पर विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल दोनों सड़क पर उतर आए। धरना-प्रदर्शन के दौरान राज्य मंत्री दिनेश सिंह और भाजपा के वरिष्ठ नेता मनोज कुमार पांडे ने भी पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि कानून का पालन होना चाहिए, न कि मनमानी।

हालांकि विरोध शुरू होने के बावजूद पुलिस प्रशासन ने शुरुआत में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। जैसे-जैसे आंदोलन तेज होता गया और माहौल गरमाया, वैसे-वैसे प्रशासन पर दबाव बढ़ता चला गया। आखिरकार पुलिस अधीक्षक ने जिले में बड़े पैमाने पर तबादले कर दिए। सलोन, मिल एरिया, शिवगढ़, बछरावां और डलमऊ जैसे महत्वपूर्ण थानों के प्रभारी बदले गए और सलोन के कोतवाल राघवन कुमार सिंह को डलमऊ भेज दिया गया। इसके साथ ही एक दरोगा को भी पहले लालगंज और फिर पुलिस लाइन भेजा गया।

इन तबादलों ने भले ही एक administrative action का रूप लिया हो, लेकिन जनता के बीच इसे सजा के रूप में नहीं देखा जा रहा। लोग पूछ रहे हैं कि अगर किसी अधिकारी पर गंभीर आरोप थे, तो सिर्फ उसका स्थान बदल देने से क्या समस्या खत्म हो जाती है? क्या एक विवादित अधिकारी को दूसरे क्षेत्र में भेज देना ही जवाबदेही है? यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि जिन आरोपों के चलते आंदोलन हुआ, उनकी निष्पक्ष जांच या सार्वजनिक रिपर्ट सामने नहीं आई।

रायबरेली के लोगों में यह चर्चा आम है कि अगर बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद सड़क पर न उतरते, तो शायद यह तबादले भी नहीं होते। इससे यह धारणा मजबूत हुई है कि पुलिस प्रशासन अपने निर्णय खुद लेने के बजाय दबाव के आगे झुक रहा है। कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली संस्था अगर इस तरह से external pressure में फैसले लेती है, तो उसकी credibility पर असर पड़ना स्वाभाविक है।

सबसे ज्यादा हैरानी इस बात पर है कि कार्रवाई में देरी क्यों हुई। अगर शुरुआत में ही स्थिति की गंभीरता को समझकर कदम उठाया जाता, तो शायद मामला इतना न बढ़ता। लेकिन पहले चुप्पी और फिर अचानक बड़े स्तर पर तबादले—इस क्रम ने पुलिस की मंशा पर सवालिया निशान लगा दिया है। लोग यह भी कह रहे हैं कि छोटे कर्मचारियों पर तो कार्रवाई दिखाई गई, लेकिन बड़े अधिकारियों पर सिर्फ “adjustment” कर दी गई।

यह पूरा घटनाक्रम पुलिस की independence और neutrality को लेकर चिंता बढ़ा रहा है। जनता यह देख रही है कि प्रशासन कानून के आधार पर काम कर रहा है या फिर संगठनों और राजनीति के दबाव में। रायबरेली में इस मुद्दे ने law and order से ज्यादा भरोसे के संकट को जन्म दे दिया है।


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