आधार का असली संकट: सबसे ज़रूरी पहचान ही सबसे बड़ी उलझन बनी, नागरिक फँसे नीतियों की जाँच-पड़ताल में

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रिपोर्ट: संदीप मिश्रा, रायबरेली, उत्तर प्रदेश, कड़क टाइम्स

समाजवादी पार्टी अल्पसंख्यक सभा के वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एडवोकेट आफ़ताब अहमद रज्जू खान ने आधार व्यवस्था को लेकर सरकार पर तीखा सवाल खड़ा किया है। उन्होंने कहा कि जिस आधार कार्ड को देश की सबसे बड़ी डिजिटल पहचान के रूप में स्थापित किया गया, वही आज आम नागरिकों की रोजमर्रा की जरूरतों में सबसे बड़ी रुकावट बन चुका है। पिछले दस–बारह वर्षों में सरकार ने जिस दस्तावेज़ को हर योजना, हर लाभ और हर सुविधा से जोड़ दिया, उसकी बुनियाद में आज भी कई ऐसी खामियाँ हैं, जिनका खामियाज़ा जनता भुगत रही है।

रज्जू खान का कहना है कि आधार को बैंक खाता खोलने से लेकर पासपोर्ट आवेदन तक, स्कूल एडमिशन से लेकर सरकारी scholarship तक—almost every service के लिए अनिवार्य बना दिया गया है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि यही आधार देश की सबसे मूलभूत पहचान—जन्म तिथि—के प्रमाण के रूप में अभी भी मान्य नहीं माना जाता। वह कहते हैं कि सरकार के इस दोहरे रवैये ने पहचान व्यवस्था को उलझन भरा बना दिया है।

यूपी समेत कई राज्यों में लाखों बच्चों का डेटा शिक्षा पोर्टल, UDISE+, DBT सिस्टम और scholarship verification में सिर्फ इसलिए अटका हुआ है क्योंकि उनके आधार की जन्मतिथि स्कूल रिकॉर्ड या जन्म प्रमाणपत्र से मिलान नहीं खाती। नागरिक महीनों तक आधार centers और सरकारी दफ्तरों के बीच चक्कर काटते रहते हैं, लेकिन आधार की किसी भी गलती को ठीक कराना आज भी बेहद कठिन और समय लेने वाला काम है। अक्सर यह देरी बच्चों की छात्रवृत्ति रोक देती है, कई परिवारों को सरकारी लाभ मिलने बंद हो जाते हैं, और कई आवेदनों पर सीधा “rejected due to mismatch” लिख दिया जाता है।

रज्जू खान कहते हैं कि सरकार ने लोगों को यह भरोसा दिलाया था कि भविष्य में पहचान का एकमात्र आधार—आधार कार्ड—ही होगा। लेकिन वास्तविकता यह है कि वही आधार कानूनी रूप से कई जगह अंतिम प्रमाण के रूप में मान्य ही नहीं है। एक ओर सरकार हर सुविधा—फोन सिम से लेकर बैंक KYC और ration तक—को आधार पर निर्भर कर रही है, दूसरी ओर कई विभाग आधार पर दर्ज जन्मतिथि, पता या अन्य सूचनाओं को स्वीकारने से ही मना कर देते हैं।

यह विरोधाभास नागरिकों के लिए भारी परेशानी का कारण बन रहा है। लोग पिछले एक दशक में बार-बार linking, re-linking, updating और verification की प्रक्रियाओं में उलझकर थक चुके हैं। बैंक, स्कूल, राशन कार्ड, मोबाइल नंबर—हर जगह आधार को केंद्र में रख दिया गया है, पर इसकी गड़बड़ियों को सुधारने की प्रक्रिया आज भी outdated, धीमी और बेहद जटिल है।

रज्जू खान ने कहा कि समस्या केवल तकनीकी नहीं है, बल्कि नीतियों की अस्पष्टता ने इसे और गंभीर बना दिया है। यदि सरकार सच में आधार को देश की सबसे बड़ी पहचान बनाना चाहती है, तो सबसे पहले इसे जन्म प्रमाणपत्र, स्कूल रिकॉर्ड, और अन्य सरकारी दस्तावेजों के साथ एकीकृत (integrated) करना होगा। जब तक डेटा की एकरूपता नहीं बनेगी, तब तक यह भ्रम खत्म नहीं होगा।

उन्होंने कहा, “आधार पहचान को आसान बनाने के लिए लाया गया था, लेकिन अधूरी नीतियों और असंगत नियमों ने इसे पहचान से ज्यादा परेशानी का दस्तावेज़ बना दिया है। लोग सुविधा पाने की जगह उलझनों से जूझ रहे हैं।”


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