योगी सरकार की नई पहल: गोण्डा में मनोरमा नदी के पुनर्जीवन से लौटेगी सांस्कृतिक और पर्यावरणीय धरोहर

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रिपोर्ट: आशीष श्रीवास्तव, ब्यूरो चीफ – उत्तर प्रदेश, कड़क टाइम्स


उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार आज न केवल बुनियादी विकास पर बल दे रही है, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत को फिर से संवारने का भी प्रयास कर रही है। इसी दिशा में गोण्डा जिले में शुरू हुआ है मनोरमा नदी पुनर्जीवन अभियान, जो सिर्फ एक नदी की सफाई नहीं, बल्कि संपूर्ण पर्यावरणीय और सामाजिक चेतना का पुनर्जागरण है।

एक लंबे समय से सूखी और उपेक्षित इस नदी को फिर से प्रवाहित करने का कार्य शुरू हो गया है, जिससे गोण्डा की पहचान और लोगों की आस्था दोनों को नया जीवन मिलेगा।


मनोरमा नदी: सूखती पहचान को मिल रही है नई संजीवनी

मनोरमा नदी का अस्तित्व बीते वर्षों में खत्म होने की कगार पर पहुंच गया था। जलधारा रुक चुकी थी, अतिक्रमण और गाद ने इसके रास्ते बंद कर दिए थे। लेकिन अब जिला प्रशासन द्वारा इस नदी को उसके पुराने स्वरूप में लौटाने का अभियान शुरू हो गया है।

जिलाधिकारी नेहा शर्मा ने खुद नदी के पूरे प्रवाह क्षेत्र का निरीक्षण किया और साफ निर्देश दिए कि गोंडा-बलरामपुर रोड से लेकर ताड़ी लाल गांव तक नदी को पूरी तरह साफ कर, उसका बहाव दोबारा शुरू किया जाए।


हरियाली और देशी वृक्षों से संवरेगा तट

नदी की दोनों किनारों को हरा-भरा बनाने के लिए वृक्षारोपण की योजना भी बनाई गई है। खास तौर पर पीपल, नीम और पाकड़ जैसे देशी और पर्यावरण हितैषी वृक्षों को प्राथमिकता दी जाएगी। इस काम की जिम्मेदारी वन विभाग को दी गई है, जिससे ना केवल हरियाली बढ़ेगी बल्कि जैव विविधता को भी बल मिलेगा।


श्रमिक से लेकर विशेषज्ञ तक, सभी का सहयोग

मनरेगा के तहत श्रमिकों को इस अभियान से जोड़ा गया है। सिंचाई विभाग को नदी की दिशा, गहराई और संरचना के तकनीकी विश्लेषण का काम सौंपा गया है, जबकि वन विभाग वृक्षारोपण की संपूर्ण योजना पर काम कर रहा है।

जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया है कि यह सिर्फ एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि जनता के सहयोग से चलाया जाने वाला जन आंदोलन होगा, जिसमें स्थानीय समाजसेवियों, ग्राम पंचायतों और स्कूल-कॉलेजों के छात्रों को जोड़ा जाएगा।


सांस्कृतिक विरासत को दोबारा जीवंत करने का संकल्प

मनोरमा नदी न केवल जल स्रोत है, बल्कि यह धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका उल्लेख पुराणों में मिलता है और कहा जाता है कि इसका नाम महर्षि उद्दालक की पुत्री मनोरमा के नाम पर रखा गया। यह नदी तिर्रे ताल से निकलती है और बस्ती होते हुए कुआनों नदी में मिलती है।

प्राचीन काल से इस नदी को पवित्र माना जाता रहा है और मखौड़ा धाम जैसे स्थान इसके पावन तट पर बसे हैं, जो अनेक धार्मिक अनुष्ठानों का केंद्र रहे हैं।


लोगों को जोड़ने की अनूठी पहल

जिला प्रशासन अब इस मुहिम को गांव-गांव पहुंचाने की तैयारी में है। पंचायत प्रतिनिधियों, महिला स्वयं सहायता समूहों और स्कूली बच्चों को इस अभियान से जोड़ने की कार्ययोजना तैयार की गई है। इसके तहत नुक्कड़ नाटक, दीवार लेखन और सोशल मीडिया अभियानों के ज़रिए जागरूकता फैलाई जा रही है।


निष्कर्ष: नदी नहीं, पहचान का पुनर्जन्म है यह

मनोरमा नदी को पुनर्जीवित करने का प्रयास केवल एक विकास परियोजना नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुनर्जन्म का प्रतीक है। यह दिखाता है कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति और जन सहयोग से कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं है। गोण्डा की यह पहल अब पूरे उत्तर प्रदेश के लिए प्रेरणा बन सकती है।

इस अभियान से न केवल पर्यावरण सुधरेगा, बल्कि रोजगार, सांस्कृतिक गौरव और सामाजिक चेतना में भी वृद्धि होगी। यह अभियान साबित करता है कि नदियां केवल जल की नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और जीवनशैली की भी धरोहर हैं।


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